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Friday, 17 May 2013

तेनालीराम और धोबी

तेनालीराम ने कहीं सुना था कि एक दृष्ट आदमी साधु का भेष बनाकर लोगों को अपने जाल में फंसा लेता है। उन्हें प्रसाद में धतूरा खिला देता है। यह काम वह उनके शत्रुओं के कहने पर धन के लालच में करता था। धतूरा खाककर कोई तो मर जाता और कोई पागल हो जाता।
उन दिनों भी उसके धतूरे के प्रभाव से एक व्यक्ति पागल होकर नगर की सड़कों पर घूमा रहा था। लेकिन धतूरा खिलाने वाले व्यक्ति के खिलाफ उसके पास  कोई प्रमाण नहीं था। इसलिए वह खुलेआम सीना तानकर चला करता। तेनालीराम ने सोचा कि ऐसे व्यक्ति को अवश्य दंड मिलना चाहिए।


एक दिन जब वह दृष्ट व्यक्ति शहर की सड़कों पर आवारागर्दी कर रहा था, तो तेनालीराम उसके पास गया और उसे बातों में उलझाए रखकर उस पागल के पास ले गया, जिसे धतूरा खिलाया गया था। वहां जाकर चुपके से तेनालीराम ने उसका हाथ पागल के सिर पर दे मारा।

उस पागल ने आव देखा न ताव, उस आदमी के बाल पकड़कर उसका सिर पत्थर पर टकराना शुरू कर दिया। पागल तो था ही, उसने उसे इतना मारा कि वह पाखंडी साधु मर गया। मामला राजा तक पहुंचा। राजा ने पागल को तो छोड़ दिया, लेकिन क्रोध में तेनालीराम को यह सजा दी कि इसे हाथी के पांवों से कुचलवाया जाए, क्योंकि इसी ने इस पागल का सहारा लेकर साधु के प्राण ले लिए।

दो सिपाही तेनालीराम को शाम के समय एक सुनसान एकांत स्थान पर ले गए और उसे गर्दन तक जमीन में गाड़ दिया। इसके बाद वे हाथी लेने चले गए। सिपाहियों ने सोचा कि अब यह बच भी कैसे सकता है! कुछ देर बाद वहां से एक कुबड़ा धोबी निकला। उसने तेनालीराम से पूछा, ‘क्यों भाई यह क्या तमाशा है? तुम इस तरह जमीन में क्यों गड़े हो?’

तेनालीराम ने कहा-‘कभी मैं भी तुम्हारी तरह कुबड़ा था, पूरे दस साल मैं इस कष्ट से दुखी रहा। जो देखता वही मुझ पर हंसता। यहां तक कि मेरी पत्नी भी। आखिर एक दिन अचानक मुझे एक महात्मा मिल गए। वह मुझसे बोले, ‘इस पवित्र स्थान पर पूरा एक दिन आंख बंद किए और बिना एक शब्द भी बोले गर्दन तक खड़े रहोगे तो तुम्हारा कष्ट दूर हो जाएगा। मिट्टी खोदकर मुझे बाहर निकालकर तो जरा देखो कि मेरा कूबड़ दूर हो गया है कि नहीं?’ धोबी ने उसके चारों ओर की मिट्टी खोदी।

जब तेनालीराम बाहर निकला तो धोबी बहुत हैरान हुआ। सचमुच कूबड़ का कहीं नाम निशान तक नहीं था। वह तेनालीराम से बोला, ‘सालों हो गए इस कूबड़ के बोझ को पीठ पर लादे हुए। मैं क्या जानता था कि इसका इलाज इतना आसान है। मुझ पर इतनी कृपा करो, मुझे यहीं गाड़ दो। मेरे ये कपड़े धोबी मुहल्ले में जाकर मेरी पत्नी को दे देना और उससे कहना कि वह सवेरे मेरा नाश्ता ले आए। मैं तुम्हारा यह अहसान जीवन-भर नहीं भूलूंगा. और, हां मेरी पत्नी को यह मत बताना कि कल तक मेरा कूबड़ ठीक हो जाएगा। मैं कल उसे हैरान करना चाहता हूं।’

‘बहुत अच्छा।’ तेनालीराम ने धोबी से कहा और उसे गर्दन तक गाड़ दिया। फिर उसके कपड़े बगल में दबाकर बोला,‘अच्छा, तो मैं चलता हूं। अपनी आंखें बंद रखना और मुंह भी, चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए, नहीं तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी और यह कूबड़ बढ़कर दो गुना हो जाएगा।’

धोबी बोला ‘चिंता मत करो, मैंने कूबड़ के कारण बड़े दुख उठाए हैं। इसे दूर करने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं।’ धोबी ने कहा। तेनालीराम वहां से चलता बना। कुछ देर बाद राजा के सिपाही एक हाथी लेकर पहुंचे और धोबी का सिर उसके पांवों तले कुचलवा दिया। सिपाहियों को पता नहीं चला कि यह कोई और व्यक्ति है।

सिपाही तेनालीराम की मृत्यु का समाचार लेकर राजा के पास पहुंचे। तब तक उनका क्रोध शांत हो गया था और वे दुखी थे, क्योंकि उन्होंने तेनालीराम को मृत्युदंड दिया। तब तक उस पाखंडी साधु के बारे में भी उन्हें काफी कुछ पता चल चुका था। वह सोच रहे थे, ‘बेचारे तेनालीराम को बेकार ही अपनी जान गंवानी पड़ी। उसने तो एक ऐसे अपराधी को दंड दिया था, जिसे मेरे पुलिस अफसर भी नहीं पकड़ सके थे।’

अभी राजा सोच में ही डूबे थे कि तेनालीराम दरबार में आ पहुंचा और बोला,‘महाराज की जय हो!’ राजा सहित सभी आश्चर्य से उसके चेहरे की ओर देख रहे थे।

तेनालीराम ने राजा कृष्णदेव राय को सारी कहानी कह सुनाई। राजा ने उसे क्षमा कर दिया।

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