मेरे जीवन की फ़िल्मी
कहानी अब से सोलह साल पीछे से शुरू होती है | तब मैं अपने छोटे-से शहर के एक
हाईस्कूल में पढता था | हाईस्कूल में किसी तरह पहुच गया था | नवीं क्लास में पूरे
पांच साल फ़ैल होने के बाद हाईस्कूल में पहुचने पर कामयाब हुआ था |
मैं अक्सर ही गणित
के पीरियड में देर से पहुचता था | जब पहुँचता, मालूम पड़ता कि अब तक गणित के मास्टर
जी करीब दो दर्जन लड़कों की पिटाई कर चुके हैं |
सभी का हाल मेरे
जैसा ही था | मुझे देखते ही मास्टर साहब की बाँहे खिल जाती थी, क्योकि मुझे पीटने
में उन्हें बहुत मजा आता था | वो मेरे बाल पकड़कर नोंचते और कहते, “कितना
प्रतिभाशाली छात्र है, कक्षा नौ में पूरे पाँच साल फ़ैल हुआ है, अब दसवीं में कब तक
रहेगा ?”
जब मास्टर जी
मर-पीटकर थक जाते थे, तो जेब से तम्बाकू की पुड़िया निकाल कर खाते और फिर
ब्लैकबोर्ड पर सवाल समझाना शुरू कर देते थे |
मैं मार खा-खाकर ऊब
गया था, इसीलिए पीरियड से गायब होना शुरू कर दिया | एक दिन हैडमास्टर साहब ने मुझे
ऑफिस में बुलाया और कहा, “देखो बेटा, इस तरह से पीरियड से गायब रहोंगे तो कभी भी
पास नहीं हो सकते |”
मैं खड़ा हुआ निगाह
नीची किये मुस्करा रहा था | मुझे मुस्कराता देख हैडमास्टर को गुस्सा आ गया |
उन्होंने भी मुझे पीटना शुरू कर दिया | अब जब भी हैडमास्टर के हाथों में खुजली
होती, वह मुझे पीटकर अपने हाथों की खुजली मिटाता था |
मेरे एक दोस्त ने
दाढ़ी रखी हुई थी | उससे मेरी बहुत गहरी दोस्ती थी | वह दसवीं में तीन साल फ़ैल हो
चुका था | वह मेरा दोस्त और गुरु दोनों था | उसको देखकर मैंने भी दाढ़ी रख ली | एक
दिन मेरी बढ़ी दाढ़ी देखकर मेरे पिताजी बोले, “यह लुच्चे लफंगों जैसी दाढ़ी क्यों रखी
है ? मेरी इज्जत का कुछ ख्याल है की नहीं ? लोग क्या कहेंगे कि लाला हरगुनदास का
लोफर लड़का है |”
पिताजी बोले जा रहे
थे और मैं ढीठ बना मुस्कराता रहा | इस पर वह मुझ पर पिल पड़े | बीच में अम्मा आ गई
तो मैं बच गया | वरना बुरी तरह से मार खता, क्योंकि पिताश्री मुझे पीटने के लिए
बाज़ार से एक हंटर, पूरे दो सौ रूपये खर्च करके लाये थे |
उसी रात मैंने दीवार
की ओंट से सुना, कि अम्मा जी पिताश्री को समझा रहीं थी, “बाँके अब जवान हो गया है
| किसी दिन कुछ कह देगा तो क्या इज्जत रह जाएगी तुम्हारी ? आज तक उसके ऊपर
मारने-पीटने का तो कुछ असर हुआ नहीं, अब क्या होगा ? उसको उसी के हाल पर छोड़ दो |”
पिताश्री को अम्मा
जी की बात समझ में आ गयी थी | दूसरे दिन सुबह रविवार था | पिताश्री मुझे अपने साथ
हजामत करने वाले की दूकान पर ले गए और नाई से कहा, “इसकी दाढ़ी साफ़ करके इसे आदमी
बना दो |” मैंने आज्ञाकारी लड़के की तरह, अपने आप को नाई के हवाले कर दिया | जब नाई
का उस्तरा चला तो ऐसा लगा कि जैसे मेरी इज्जत पर तलवारें चल रही हैं |
उस रात मैंने खाना
नहीं खाया | अम्माजी ने बहुत समझाया तो मैं सुबककर रो पड़ा और बोला, “सब बड़े आदमी
दाढ़ी रखते हैं | इससे तो आदमी का व्यक्तित्व बनता है |”
अम्मा जी ने मुझे
धीरज बधाया, “घबराओ नहीं बेटा, एक हफ्ते में फिर निकल आएगी | दाढ़ी तो घर की खेती
है | अम्मा जी बात समझ में आ चुकी थी | अगले दिन मैं स्कूल नहीं गया और बीमार होने
का प्रार्थनापत्र भेज दिया |
एक हफ्ता बीता तो
दाढ़ी निकल आयी | नाई के पास पहुँचा और फ्रेंच-कट दाढ़ी बनवाई | फ्रेंच-कट दाढ़ी रखकर
मैं स्कूल पहुँचा | क्लास में दाखिल होते ही सारे लड़कों ने तालियाँ बजाई | सभी
मेरे फ्रेंच-कट दाढ़ी की तारीफ़ कर रहे थे | हैडमास्टर व अन्य मास्टरों ने भी मेरी
दाढ़ी की तारीफ़ की | ये सिर्फ दाढ़ी नहीं बल्कि एक डिग्री थी जो लोगो से मेरी तारीफ़
करवाती थी |
पिताश्री से नजर
बचाकर स्कूल जाता और रात को देर से घर आता | एक दिन मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि
मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी देखकर भी पिता जी कुछ नहीं बोले | मई समझ गया कि अम्मा जी ने ही
पिताश्री को समझाया होगा |
स्कूल के वार्षिक
उत्सव पर नाटक के मंचन की तैयारी होने वाली थी | इस नाटक में एक डॉक्टर के रोल के
लिए मुझे चुना गया | रिहर्सल के दिनों में मास्टर जी बोले, “बाँके तुम तो जन्मजात
अभिनेता हो |” जब नाटक खेला गया था, तो मेरे रोल पर दर्शकों ने खूब तालियाँ बजाई
थी |
नाटक समाप्त हुआ |
दूसरे दिन इनाम बाँटे जाने थे | मुझे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला |
पुरस्कार वितरण समारोह में मेरे पिताजी और अम्माजी भी आये थे | जब मैं इनाम लेकर
डरता-डरता पिताश्री के पास पहुँचा, तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया | इस प्यार ने
पूरी दुनिया ही बदल डाली |
मैं मुंबई चला गया
और फिल्मों में हाथ-पैर मारने लगा | किसी तरह मैं अभिनेता बनने में कामयाब हो गया
|
मेरी एक फिल्म जब
मेरे शहर में लगी तो मेरे सारे साथी, मोहल्ले वाले, अम्माजी और स्कूल के हैडमास्टर
और अन्य सभी मास्टर फिल्म देखने गए |
जब फिल्म समाप्त हुई
तो सभी ने मुझे गले से लगा लिया | जो मास्टर जी मुझे पीटते थे, सबसे आगे-आगे वही
मुझे अपने कन्धों पर उठाने की कोशिश कर रहे थे | बेचारे बूढ़े हो चुकें थे,
उन्होंने जैसे ही मुझे उठाया, तो गिर पड़े | इस पर सारे लोग हँसने लगे | मैंने
मास्टर जी को तुरंत उठाकर अपने गले से लगा लिया |
A story by – Vinay Kumar Mishra
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